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श्री सत्य साई सेवा संगठनमध्य प्रदेश
सुनहरी शाम में पुट्टपर्ती की पहाड़ियाँ और चित्रावती

भगवान श्री सत्य साई बाबा · 1926 — 2011

स्वामी का जीवन

पुट्टपर्ती के एक छोटे गाँव से विश्व भर के करोड़ों हृदयों तक: एक ऐसा जीवन जिसमें प्रेम निरंतर कर्म बनता रहा।

संक्षेप में

स्वामी का जीवन, एक अनुच्छेद में

भगवान श्री सत्य साई बाबा का जन्म 23 नवंबर 1926 को पुट्टपर्ती में सत्यनारायण राजू के रूप में हुआ। 20 अक्टूबर 1940 को उन्होंने अवतार उद्घोषणा की, 23 नवंबर 1950 को प्रशांति निलयम का उद्घाटन हुआ, 1960 के दशक में सेवा संगठन और 1972 में केंद्रीय ट्रस्ट बना, जिसके निःशुल्क अस्पताल, विद्यालय और पेयजल परियोजनाएँ आज भी चल रही हैं। 24 अप्रैल 2011 को उन्होंने देह त्याग किया; 2025 से उनका शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है।

अध्याय 1

अवतरण और बचपन

पुट्टपर्ती का एक धर्मपरायण परिवार, और एक बालक जिसका हृदय हर दुखी के लिए पिघल जाता था।

  1. 1926

    23 नवंबर 1926, सोमवार

    पुट्टपर्ती में जन्म

    सुनहरी शाम में पुट्टपर्ती की पहाड़ियाँ और चित्रावती

    कार्तिक मास के सोमवार को, सूर्योदय के समय, माता ईश्वरम्मा और पिता श्री पेद्द वेंकम राजू के घर बालक का जन्म हुआ। माता ने सत्यनारायण पूजा का व्रत रखा था, इसलिए नाम रखा गया सत्यनारायण राजू; गाँव उन्हें प्यार से ‘सत्य’ कहता था।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  2. बचपन

    करुणा का बालक

    भिखारी द्वार पर आता तो सत्य खेल छोड़कर भीतर दौड़ते और बहनों से अन्न दिलवाते; बड़े चेताते कि तब तुम्हें भूखा रहना पड़ेगा, तो वे अपना भोजन ही छोड़ देते। लगभग दस वर्ष की आयु में उन्होंने गाँव के बालकों की ‘पंढरी भजन’ मंडली बनाई।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

अध्याय 2

उद्घोषणा

1940 का वर्ष, जब सत्य ने अपने वास्तविक स्वरूप की घोषणा की।

  1. 1940

    23 मई 1940

    “मैं साई बाबा हूँ”

    उरवकोंडा में सत्य ने घर के लोगों और पड़ोसियों को हाथ हिलाकर मिश्री और फूल दिए। पिता ने क्रोध में पूछा कि तुम कौन हो, तो उत्तर आया, वह उद्घोषणा जो अब तक रोकी गई थी।

    “मैं साई बाबा हूँ।”

    — 23 मई 1940

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  2. 1940

    20 अक्टूबर 1940

    अवतार उद्घोषणा

    कश्मीर में पहाड़ी नदी के किनारे युवा भगवान श्री सत्य साई बाबा

    हम्पी से लौटने के अगले दिन सत्य विद्यालय के लिए निकले, कुछ ही मिनटों में लौट आए, देहरी पर पुस्तकें फेंक दीं और पुकारकर कहा कि अब वे किसी परिवार के नहीं, अपने भक्तों के हैं। उसी दिन से सत्यनारायण राजू, सत्य साई बाबा बन गए।

    “अब मैं तुम्हारा सत्य नहीं हूँ… मैं साई हूँ। मेरा अपना कार्य है, मैं अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकता।”

    — 20 अक्टूबर 1940

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

भगवान श्री सत्य साई बाबा की करुणामयी दृष्टि

“अब मैं तुम्हारा सत्य नहीं हूँ… मैं साई हूँ।”

— उरवकोंडा, 20 अक्टूबर 1940

अध्याय 3

मिशन की नींव

एक छोटा मंदिर, एक पत्र, पहला प्रवचन, और ‘परम शांति का धाम’।

  1. 1947

    फ़रवरी 1947

    पुराना मंदिर

    पुट्टपर्ती आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ी तो फ़रवरी 1947 में एक मंदिर बना, जहाँ स्वामी रहने लगे और दर्शन देने लगे।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  2. 1947

    25 मई 1947

    भाई शेषम राजू को पत्र

    बढ़ती ख्याति और ईर्ष्यालु आलोचना से चिंतित बड़े भाई श्री शेषम राजू ने उन्हें सावधान करते हुए पत्र लिखा। उत्तर में स्वामी ने अपने जीवन का उद्देश्य स्पष्ट शब्दों में लिखा: एक कार्य, एक व्रत और एक प्रिय काम। पूरा उद्धरण नीचे पढ़ें।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  3. 1947

    25 अक्टूबर 1947

    करूर में पहला सार्वजनिक प्रवचन

    तमिलनाडु के करूर में स्वामी ने पहला सार्वजनिक प्रवचन दिया। इसके बाद 63 वर्षों तक हज़ारों दिव्य प्रवचन हुए, जो ‘श्री सत्य साई स्पीक्स’ के 42 खंडों में संकलित हैं।

    स्रोत:ssssoindia.org — संदेश ↗

  4. 1950

    23 नवंबर 1950

    प्रशांति निलयम का उद्घाटन

    रात्रि में आलोकित प्रशांति मंदिर, प्रशांति निलयम

    स्वामी के 25वें जन्मदिन पर ‘परम शांति का धाम’ प्रशांति निलयम का उद्घाटन हुआ। यही आज भी दर्शन और उत्सवों का केंद्र है, और विश्व भर के सेवा संगठनों का केंद्र-बिंदु भी।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗ssssoindia.org — प्रमुख केंद्र ↗

  5. 1958

    महाशिवरात्रि, 1958

    ‘सनातन सारथी’ पत्रिका का आरंभ

    महाशिवरात्रि के पावन दिन ‘सनातन सारथी’ आरंभ हुई। 1958 से 1984 तक स्वामी ने इसमें लेख लिखे, जो आगे चलकर 15 ‘वाहिनी’ ग्रंथों के रूप में प्रकाशित हुए।

    स्रोत:ssssoindia.org — संदेश ↗

25 मई 1947

कार्य, व्रत और प्रिय काम

बड़े भाई श्री शेषम राजू को लिखे पत्र में स्वामी ने अपने अवतरण का उद्देश्य घोषित किया।

  1. “I have a Task: To foster all mankind and ensure for all of them lives full of Ananda (Bliss).”मेरा एक कार्य है: समस्त मानवता का पोषण करना और सबके जीवन को आनंद से परिपूर्ण करना।

  2. “I have a Vow: To lead all who stray away from the straight path, again into goodness and save them.”मेरा एक व्रत है: सीधे मार्ग से भटके हुए सभी लोगों को फिर से सद्मार्ग पर लाना और उनकी रक्षा करना।

  3. “I am attached to a Work that I love: To remove the sufferings of the poor and grant them what they lack.”मैं एक ऐसे काम से जुड़ा हूँ जो मुझे प्रिय है: गरीबों के कष्ट दूर करना और उन्हें वह देना जिसका उन्हें अभाव है।

  4. “I have a reason to be proud, for I rescue all who worship and adore Me.”मुझे गर्व करने का एक कारण है, क्योंकि मुझे पूजने और प्रेम करने वाले हर व्यक्ति की मैं रक्षा करता हूँ।

भगवान श्री सत्य साई बाबा, श्री शेषम राजू को पत्र, 25 मई 1947। अंग्रेज़ी पाठ ssssoindia.org पर प्रकाशित रूप में; हिंदी भावानुवाद। ssssoindia.org/his-life ↗

अध्याय 4

संगठन और निःशुल्क सेवा

प्रेम को कर्म में बदलने वाले संस्थान: सेवा संगठन, केंद्रीय ट्रस्ट और स्थायी चार्टर।

  1. 1960 का दशक

    1960 का दशक

    श्री सत्य साई सेवा संगठन

    1960 के दशक में स्वामी ने भारत में श्री सत्य साई सेवा संगठन का बीज बोया, जिसमें हर धर्म, वर्ग और जाति के लोग मिलकर निःस्वार्थ सेवा करते हैं और सत्य, धर्म, शांति, प्रेम, अहिंसा के शाश्वत मूल्यों को जीते हैं।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  2. 1972

    श्री सत्य साई केंद्रीय ट्रस्ट

    नए नल से मिट्टी के घड़े में बहता स्वच्छ पेयजल

    सेवा के जीवंत आदर्श खड़े करने के लिए 1972 में केंद्रीय ट्रस्ट की स्थापना हुई। इसके माध्यम से निःशुल्क प्राथमिक से सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल, प्राथमिक से शोध-स्तर तक निःशुल्क शिक्षा, दूरस्थ गाँवों तक निःशुल्क पेयजल और निःशुल्क आवास पुनर्वास के कार्य हुए।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  3. 1981

    14 जनवरी 1981

    स्थायी चार्टर

    तृतीय विश्व सम्मेलन के अवसर पर स्वामी ने श्री सत्य साई सेवा संगठनों को स्थायी चार्टर प्रदान किया, जो आज भी संगठन के संचालन का आधार है।

    स्रोत:ssssoindia.org — चार्टर ↗

फूलों भरे बगीचे के साथ प्रशांति निलयम स्थित श्री सत्य साई उच्च शिक्षा संस्थान का भवन

आज भी जारी

प्रेम, जो निःशुल्क है

स्वामी के सेवा कार्यों का मूल सूत्र है: सब कुछ निःशुल्क। सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों में तृतीयक स्तर की चिकित्सा, मूल्याधारित शिक्षा देने वाले विद्यालय-महाविद्यालय, और विशाल पेयजल परियोजनाएँ, उनके निःस्वार्थ प्रेम की साक्षी हैं।

अध्याय 5

स्वर्णिम समापन और शताब्दी

देह से परे, सार्वभौमिक चेतना के रूप में श्री सत्य साई सदा विद्यमान हैं।

  1. 2008 · 2010

    नवंबर 2008 और नवंबर 2010

    स्वर्ण रथ

    अपने 83वें और 85वें जन्मदिन पर, भक्तों के अनुरोध पर, स्वामी स्वर्ण रथ पर विराजे। बाद में सबने समझा कि ये उनकी पार्थिव यात्रा के स्वर्णिम समापन के प्रतीक थे।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  2. 2011

    24 अप्रैल 2011

    महासमाधि

    बैठे भक्तों के बीच चलते भगवान श्री सत्य साई बाबा का श्वेत-श्याम चित्र

    स्वामी ने देह त्याग किया। भक्त उनके भौतिक रूप की कमी अनुभव करते हैं, फिर भी उनका मार्गदर्शन और कृपा पहले की तरह अनुभव करते हैं।

    स्रोत:ssssoindia.org — जीवन ↗

  3. 2025 – 26

    शताब्दी वर्ष

    शताब्दी समारोह

    भगवान के 100वें जन्मदिवस पर कलश और दीप लिए शोभायात्रा

    वर्ष 2025 से भगवान के अवतरण के सौ वर्षों का शताब्दी समारोह आरंभ हुआ। 20–21 नवंबर 2025 को ‘विश्व शांति के मार्ग’ विषय पर ग्यारहवाँ विश्व सम्मेलन हुआ, और पाँच भव्य रथ उनका संदेश ‘सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो; सदा सहायता करो, कभी आहत मत करो’ लेकर देश भर में गए।

    स्रोत:ssssoindia.org — विश्व सम्मेलन 2025 ↗ssssoindia.org — शताब्दी ↗

उनका संदेश, आज के लिए

पाँच मानवीय मूल्य, दस सिद्धांत, और मध्य प्रदेश में उनके दिव्य पदचिह्न।