
प्रेम और सेवा
स्वामी का संदेश
प्रेम (निःस्वार्थ प्रेम) और सेवा (निःस्वार्थ सेवा): मानवता के रोगों की औषधि, और हर धर्म का सार।
सार
स्वामी का संदेश क्या है?
भगवान श्री सत्य साई बाबा का संदेश प्रेम और सेवा का है: सत्य, धर्म, शांति, प्रेम और अहिंसा के पाँच शाश्वत मानवीय मूल्य, जो सभी धर्मों का सार हैं। ‘ईश्वर का पितृत्व और मनुष्य का भ्रातृत्व’ उनका आह्वान है कि धर्म, संप्रदाय और पंथ के नाम पर लड़ने वाले मतभेद छोड़कर साथ चलें।
स्रोत: ssssoindia.org/his-message ↗
पंच मानवीय मूल्य
सत्य, धर्म, शांति, प्रेम, अहिंसा
प्रेम एक ही है; वह विचार, कर्म, भाव और समझ में भिन्न रूपों में प्रकट होता है।
“विचार में प्रेम सत्य है, कर्म में वह धर्म है, भाव में शांति है और समझ में अहिंसा है।”
सत्य
Sathya · Truth
“विचार, वाणी और कर्म की एकता ही सत्य है।”
धर्म
Dharma · Right Conduct
“जब कर्म सत्य से ओतप्रोत होता है, तब वह धर्म बन जाता है।”
शांति
Shanti · Peace
“जब सभी कर्म उचित होते हैं, तब शांति का राज होता है…”
प्रेम
Prema · Love
“प्रेम ही इन चारों का आधार और पोषण है।”
अहिंसा
Ahimsa · Non-violence
“…और मन हिंसा के हर अंश से मुक्त हो जाता है।”
पाँचों पंक्तियाँ उसी प्रवचन (1 जून 1985) से हैं। सत्य साई स्पीक्स, खंड 18 ↗
दो सूत्र
सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो। सदा सहायता करो, कभी आहत मत करो।
स्वामी का पूरा संदेश इन दो छोटे वाक्यों में समा जाता है, और संगठन का हर सेवा कार्य इन्हीं से जन्म लेता है।
सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो
“सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो। सबसे घृणा करके, सबमें दोष देखकर, सबसे ईर्ष्या करके कृपा का अनुभव कैसे हो सकता है?”
— दिव्य प्रवचन, त्रयी बृंदावन, 29 मई 1988 (सत्य साई स्पीक्स, खंड 21) स्रोत ↗
सदा सहायता करो, कभी आहत मत करो
“सदा सहायता करो, कभी आहत मत करो। किसी को हानि मत पहुँचाओ। यदि किसी की सहायता कर सकते हो, तो अवश्य करो।”
— कल्याण मंडप, बृंदावन, 10 मई 1992 (सत्य साई स्पीक्स, खंड 25) स्रोत ↗
इच्छाओं पर अंकुश
कम चाहो, व्यर्थ मत करो
‘इच्छाओं पर अंकुश’ का अर्थ सब इच्छाएँ छोड़ देना नहीं, बल्कि भोजन, धन, समय और ऊर्जा को व्यर्थ न करना है, ताकि बचा हुआ दूसरों की सेवा में लगे।
“आज जहाँ देखो, वहाँ केवल इच्छाएँ, इच्छाएँ और अधिक इच्छाएँ हैं। इन इच्छाओं पर अंकुश लगाओ! तभी तुम्हारा मन स्थिर होगा।”
- 1.
भोजन
“भोजन व्यर्थ मत करो। अन्न ही ईश्वर है।”
- 2.
धन
“धन व्यर्थ मत करो। ईश्वर ही धन है।”
- 3.
समय
“समय व्यर्थ मत करो। समय की बर्बादी जीवन की बर्बादी है।”
- 4.
ऊर्जा
“ऊर्जा व्यर्थ मत करो।”
— दिव्य प्रवचन, 24 मार्च 1993। ssssoindia.org ↗
सर्वधर्म एकता
अपने ही धर्म के बेहतर अनुयायी बनो
श्री सत्य साई सेवा संगठन न कोई धार्मिक संगठन है, न धर्मांतरण कराता है। किसी से कोई विशेष धर्म या कर्मकांड अपनाने को नहीं कहा जाता; हर व्यक्ति को अपनी ही आस्था का और अच्छे से पालन करने की प्रेरणा दी जाती है।
“हिंदू एक बेहतर हिंदू बने, ईसाई एक बेहतर ईसाई, और मुसलमान एक बेहतर मुसलमान।”
संगठन का विवरण: ssssoindia.org/about-organisation ↗
21 नवंबर 1985
दस सिद्धांत
विश्व सम्मेलन के अपने प्रवचन में स्वामी ने हर सदस्य के लिए ये दस सिद्धांत दिए, और कहा कि इन्हें उत्साह और प्रेम से निभाओ और जहाँ भी रहो, दूसरों के लिए उदाहरण बनो।
अंग्रेज़ी पाठ स्रोत के अनुसार; हिंदी भावानुवाद। ssssoindia.org ↗
- सिद्धांत 1:
मातृभूमि से प्रेम करो और उसकी सेवा करो; दूसरों की मातृभूमि से घृणा मत करो, उसे आहत मत करो।
Love and Serve the Motherland; do not hate or hurt the motherland of others.
- सिद्धांत 2:
हर धर्म का सम्मान करो; प्रत्येक धर्म उसी एक ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है।
Honour every religion; each is pathway to the one God.
- सिद्धांत 3:
बिना भेदभाव के सभी मनुष्यों से प्रेम करो; जानो कि मानवता एक ही समुदाय है।
Love all men without distinction; know that mankind is a single community.
- सिद्धांत 4:
अपने घर और आसपास को स्वच्छ रखो; इससे तुम्हें और समाज को स्वास्थ्य और सुख मिलेगा।
Keep your home and its environs clean; it will ensure health and happiness for you and for society.
- सिद्धांत 5:
भिक्षा माँगने वालों की ओर सिक्के मत फेंको; उन्हें आत्मनिर्भर बनने में सहायता करो। रोगियों और वृद्धों को भोजन और आश्रय, प्रेम और देखभाल दो।
Do not throw coins when beggars stretch their hands for alms; help them become self-reliant. Provide food and shelter, love and care, for the sick and the aged.
- सिद्धांत 6:
रिश्वत देकर किसी को प्रलोभित मत करो, न रिश्वत लेकर स्वयं को गिराओ।
Do not tempt other by offering bribes or demean yourself by accepting bribes.
- सिद्धांत 7:
किसी भी कारण से ईर्ष्या, घृणा या द्वेष मत पालो।
Do not develop jealousy, hatred or envy on any account.
- सिद्धांत 8:
अपनी निजी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर मत रहो; दूसरों की सेवा से पहले स्वयं अपने सेवक बनो।
Do not depend on other to serve your personal needs; become your own servant, before proceeding to serve others.
- सिद्धांत 9:
ईश्वर से प्रेम करो, पाप से घृणा करो।
Adore God. Abhor Sin.
- सिद्धांत 10:
राज्य द्वारा बनाए गए क़ानूनों, नियमों और विनियमों का पालन करो और आदर्श नागरिक बनो।
Observe the laws, rules and regulations laid down by the State and be ideal citizens.

“हिंदू एक बेहतर हिंदू बने, ईसाई एक बेहतर ईसाई, और मुसलमान एक बेहतर मुसलमान।”
स्वयं पढ़ें
प्रवचन और लेखन
25 अक्टूबर 1947 को करूर में पहले सार्वजनिक प्रवचन से आरंभ होकर, 1953 से 2010 तक के हज़ारों प्रवचन ‘श्री सत्य साई स्पीक्स’ के 42 खंडों में संकलित हैं। 1958 से 1984 के बीच स्वामी ने 15 ‘वाहिनी’ ग्रंथ लिखे, जो पहले ‘सनातन सारथी’ में लेखों के रूप में छपे।
संदेश को जीना: समिति में सप्ताह-दर-सप्ताह
भजन, अध्ययन मंडल, बाल विकास और सेवा: मध्य प्रदेश की हर समिति में सभी का स्वागत है।





